रामायण संदर्शन

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Saturday, March 21, 2009

सुंदरकाण्ड की सुंदरता

सुंदरकाण्ड की सुंदरता
स्व. जयदेव सिंघानिया

राम-कथा का प्राचीनतम उपलब्ध महाकाव्य आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण है। आदिकवि ने अपनी प्रखर प्रतिभा से राम-कथा को ऐसा हृदय-स्पर्शी एवं मनोरंजक रूप प्रदान किया है कि उनके द्वारा रचित रामायण मानवता का महाकाव्य बन गया। संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के राम-कथा-विषयक महाकाव्यों के रचयिताओं ने वाल्मीकि रामायण को ही आधार माना है।

इसी आधार पर संस्कृत भाषा में ‘अघ्यात्म रामायण’, ‘चम्पु रामायण’, अद्भुत रामायण’ और ‘आनंद रामायण’ इत्यादि हैं। हिन्दी भाषा में प्रमुख रामायण गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘राम-चरित-मानस’, तमिल में कम्बन कृत तमिल रामायण, तेलुगु भाषा में ‘रंगनाथ रामायण’, ‘भास्कर रामायण’ एवं ‘मोल्ला रामायण’, कन्नड भाषा में ‘तोरवे रामायण’, बंगला भाषा में चन्द्रावली कृत ‘रामायण’, मराठी भाषा में संत एकनाथ कृत ‘भावार्थ रामायण’, गुजराती भाषा में गिरधरदास कृत ‘रामायण’, उडि़या भाषा में ‘जगमोहन रामायण’ आदि की रचना हुई है। इन सभी रामायणों में एक काण्ड/सोपान है, जिसका शीर्षक है- ‘सुंदरकाण्ड’।
हिन्दी भाषा की प्रमुख रामायण तुलसी कृत राम-चरित-मानस के परिप्रेक्ष्य में सुंदरकाण्ड का वर्ण्य विषय श्री हनुमान की लंका यात्रा है जिसे उन्होंने श्रीरामचन्द्र के आदेश और जामवंतजी की प्रेरणा से सम्पन्न की थी। उद्देश्य था जानकीजी की खोज। हनुमान अपने बल-पौरुष का प्रयोग कर के वहाँ पहुँचे, सीताजी से भेंट कर प्रभु का समाचार दिया और रावण को विनाश की सूचना देते हुए, माँ का संदेश लेकर सकुशल लौट आये। सभी लोगों को सारा समाचार सुनाकर विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया। बीच-बीच में छोटे-छोटे प्रसंग भी आए हैं, जैसे - सुरसा, सिंहिका, लंकिनी आदि से भेंट, राम-भक्त विभीषण के दर्शन, अशोक वाटिका उजाड़ना, रावण के सामने उपस्थित होना और लंका को जलाना - सभी प्रसंग कथा के सामान्य अंग हैं; फिर भी सुंदरता कहाँ है? अन्य काण्डों में भी इसी प्रकार के प्रसंग हैं, किन्तु यही काण्ड सुंदर क्यों लगा, विचारणीय प्रश्न है।
सीता की दैन्य दशा देख कर श्री हनुमानजी बहुत दुखी हुए। तुलसीदासजी लिखते हैं--
तरु पल्लव महुं रहा लुकाई। करई बिचार करों का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएं बनावा॥
जब सीताजी मन में अनेक विचार और शंकाएँ कर रही थी, तब श्री हनुमान ने मधुर वाणी में रामचन्द्र्जी का गुण-गान करने लगे, जिसके सुनते ही सीताजी के दुख भाग गए और वे बोली- हे भाई! तुमने कानों के लिए अमृत रूप कथा कही है। तुम प्रकट क्यों नहीं होते? यह सुन हनुमानजी सीताजी के पास जाकर कहने लगे-
रामदूत मैं मातु जानकी।
सत्य शपथ करुना निधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तम्ह कहँ सहिदानी॥
संत एकनाथजी द्वारा रचित मराठी भाषा की ‘भावार्थ रामायण’ में इस प्रसंग के संबंध मे कहा गया है-
तेथे चमत्कार जाहला।
मुद्रा नव्हे श्रीराम आला॥
ऐसा सीतेसी भाव गमला।
सरसा विला अंचळ॥
अर्थात अपने पति के नाम की मुद्रिका देखकर सीताजी को ऐसा लगा कि प्रत्यक्ष रामचंद्रजी ही आ गये हैं और उन्होंने स्त्री-सुलभ लज्जावश अपने आँचल को ठीक किया।
मुद्रिका देखकर सीताजी को जो प्रसन्नता हुई, वो अपने विवाह के समय जो प्रसन्नता हुई थी, उससे सौ गुणा अधिक थी। देखिये ‘चम्पु रामायण’ का निम्नांकित श्लोक--
सौख्यावहस्य पवनात्म जनीयमान,
रामांगुलीयक विलोकनवासरस्य
सत्यं कलां शततमीं भुवि नैव भेजे
पाणिग्रहोत्सव दिनं जनकात्मजाय़ा।
श्री हनुमान ने सीताजी को आश्वस्त करते हुए कहा, "हे सीतामाता! मेरे वापिस लौटते ही श्रीराम सेना सहित यहाँ आयेंगे और रावण को पराजित कर आपको सम्मान सहित अयोध्या ले जायेंगे। आप बिलकुल डरे नहीं। किसी भी प्रकार की चिन्ता न करें। देखें ‘आनन्द रामायण’का यह श्लोक--
वानरेन्द्रैः समागत्य हत्वा रावण माहवे।
त्वां नेष्यति भयं सीते त्यज त्वं मम वाक्यतः॥
संस्कृत भाषा की रामायण ‘अध्यात्म रामायण’ में भी ऐसा ही कहा गया है। देखें--
रामः सलक्ष्मणः शीघ्रमागमिष्याति सायुधः,
सुग्रीवेन ससैन्येन हत्वा दशमुखं बलात्‌,
समानेष्यति देवि त्वामयोध्यां नात्र संशयः॥
‘श्री राम आयेंगे’ ये कर्ण-मधुर शब्द अमृत समान श्री सीताजी को लगे और नैराश्य के अन्धकार में डूबी माता सीताजी को श्री हनुमान का आश्वासन प्रकाश-स्तंभ की भाँति उनके हृदय को आलोकित कर दिया और श्री सीताजी के मन में उत्साह भर गया। उन्होंने श्री हनुमान को आशीष देते हुए कहा--
‘अजर अमर गुन विधि सुत होहूं। करहुं बहुत रघुनायक छोहू॥
सुन्दरकाण्ड की सुंदरता श्रीसीता-हनुमान संवाद में निहित है। जो रामकथा अयोध्याकाण्ड, अरण्य कांड और किष्किन्धा काण्ड में दुखान्त की ओर अग्रसर हो रही है, उसने सुंदरकाण्ड में मोड़ लिया और वह सुखान्त की ओर अग्रसर हुई। श्रीराम-विजय का प्रथम सोपान ‘सुंदरकाण्ड’ है, अतः इस काण्ड के बारे में कहा जाता है--
सुन्दरे सुन्दरो रामः, सुन्दरे सुन्दरी
कथा
सुन्दरे सुन्दरी सीता, सुन्दरे किं न सुन्दरम्‌॥
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[साभारः आदिज्ञान(त्रैमासिक)- जनवरी-मार्च २००९]

8 comments:

  1. ओह! जब हमें कुछ नहीं सूझता और मन नैराश्य में डूबता है, हम ले कर बैठ जाते हैं सुन्दरकाण्ड। एक चौपाई मैं कहता हूं, अगली पत्नी जी।
    और हम पार उतर जाते हैं।

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  2. अति सुन्दर. सुन्दर कांड की सुन्दरता का बखान किया ही नहीं जा सकता. अद्भुत है. यह उस सूर्य की तरह जो अन्धकार में प्रकाश देता है. वैसे मुझे इसकी सबसे सुन्दर चौपाई लगती है:

    खाएहु फल मोहि लागेउ भूखा. कपि सुभाउ ते तोरेउ रूखा.
    ****

    जे मोहि मारे ते मै मारा. तेहि पर बान्धेउ तनय तुम्हारा.
    इन पंक्तियों मे अर्थ के इतने आयाम हैं और जीवमात्र की प्रकृति का इतना सुन्दर विश्लेषण है कि क्या कहने?

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  3. ओज और तेज का कांड ! बहुत बढियां !

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  4. लोकतंत्र वैश्या के समान हैं-महात्मा गांधी
    गांधी जी आज से सौ वर्ष पूर्व यह बाते एक पत्रकार द्वारा पुछे गये सवाल के जवाव में कहा था।गांधी की ये बाते आज कितनी प्रसागिंक हैं आप अपनी राय दे ।

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  5. सुन्दर काण्ड पढकर मन तो अद्भुत शान्ति मिलती है।

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  6. प्रसाद जी
    अभिवंदन
    सबसे पहले मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आभार.
    रामायण-संदर्शन में सुन्दरकाण्ड के सुन्दरता पढा.
    बहुत ही अच्छा आलेख है.
    मेरी बधाई भी प्रेषित करें
    वाकई सच कहा है
    सुन्दर सुन्दर कांड सुहावन .. युद्ध कांड माह मरेउ रावन....

    सुन्दर कांड में हनुमान जी की भूमिका आज भी प्रासंगिक लगती है.
    ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण की भावना अद्वितीय है

    - विजय

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  7. बहुत ही सुन्दर आलेख . सुन्दरकाण्ड को समझाता विभिन्न विभूतियों का परिचय भी , ज्ञान भी .pershad जीयदि कोई स्रोत बताएं जहाँ से ये साहित्य प्राप्त हो सके.
    धन्यभाग !

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