रामायण संदर्शन
Sunday, November 2, 2008
चिट्ठा चर्चा: रविवार्ता : वाह सजण..... वाह सजण
इसे कहते हैं - ब्रेनटीज़िंग! भई, चिट्ठा हो या पट्ठा, रहेगी चिट्ठाचर्चा ही न!
Wednesday, July 30, 2008
निराला कृत 'तुलसीदास' - कतिपय अंश
निराला कृत 'तुलसीदास' - कतिपय अंश
भारत के नभ का प्रभापूर्य
शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य
अस्तमित आज रे - तमस्तूर्य दिड्.मण्डल;
उर के आसन पर शिरस्त्राण
शासन करते हैं मुसलमान;
है ऊर्मिल जल, निश्चलत्प्राण पर शतदल। (1)
युवकों में प्रमुख रत्न-चेतन
समधीत-शास्त्र-काव्यालोचन
जो, तुलसीदास, वही ब्राह्मण-कुल-दीपक;
आयत-दृग, पुष्ट-देह, गत-भय,
अपने प्रकाश में नि:संशय
प्रतिभा का मन्द-स्मित परिचय, संस्मारक। (12)
वह रत्नावली, नाम-शोभन
पति-रति में प्रतनु, अत: लोभन
अपरिचित-पुण्य अक्षय क्षोभन धन कोई;
प्रियकरालम्ब को सत्य-यष्टि;
प्रतिमा में श्रद्धा की समष्टि;
मायायन में प्रिय-शयन व्यष्टि भर सोयी। (58)
बिखरी छूटीं शफरी-अलकें,
निष्पात नयन-नीरज पलकें,
भावातुर पृथु उर की छलकें उपशमिता,
नि:सम्बल केवल ध्यान-मग्न,
जागी योगिनी अरूप-लग्न,
वह खड़ी शीर्ण प्रिय-भाव-मग्न निरुपमिता। (83)
"धिक! धाये तुम यों अनाहूत,
धो दिया श्रेष्ठ कुल-धर्म धूत,
राम के नहीं, काम के सूत कहलाये!
हो बिके जहाँ तुम बिना दाम,
वह नहीं और कुछ-हाड़, चाम!
कैसी शिक्षा, कैसे विराम पर आये!" (85)
जागा, जागा संस्कार प्रबल,
रे गया काम तत्क्षण वह जल,
देखा, वामा, वह न थी, अनल-प्रतिमा वह;
इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान,
हो गया भस्म वह प्रथम भान,
छूटा जग का जो रहा ध्यान, जड़िमा वह। (86)
- निराला
अक्षर संयोजन : के. नागेश्वर राव