रामायण संदर्शन

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Wednesday, December 17, 2008

तसि पूजा चाहिअ जस देवा


दिस.०८: आलेख

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तसि पूजा चाहिअ जस देवा


---कृष्णचन्द्र टवाणी

संत गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के नाम से आज कौन परिचित नहीं है। जिस तरह गुलाब का फूल बारहमासी होता है तथा हर क्षेत्र, हर रंग में पाया जाता है, उसी तरह रामचरितमानस का पाठ भी हर घर में आनन्द और उत्साहपूर्वक होता है।विद्वान साहित्यकार भी अपने आलेखॊं में मानस की पंक्तियों का उल्लेख कर अपनी बात को प्रमाणित करते हैं। तात्पर्य यह कि इसके द्वारा सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक सभी समस्याओं का समाधान सम्भव है। इस प्रकार रामचरितमानस विश्व का अनमोल ग्रंथ है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
रामचरित मानस एहिनामा
सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा॥
शोधकर्ताओं के लिए रामचरितमानस एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें अनेक रत्न भरे पडे हैं तथा इसका अध्ययन-मंथन सदा नूतन लगता है। जितनी बार इसे पढा़ जाय, उतनी ही बार नई-नई रहस्यपूर्ण बातों का ज्ञान होता है। अनेक विद्वानों एवं साहित्यकारों ने इस महान ग्रंथ को अपने शोध का विषय बनाकर पीएच.डी. एवं डी.लिट. की उपाधियां प्राप्त की हैं, कर रहे हैं तथा करते रहेंगे।मानस सूक्तियां-रामचरितमानस के हर पद में महाकवि तुलसीदास के चिंतन, विचारों, अनुभवों के अमृतकण सूक्तियों के रूप में बिखरे हैं।विभिन्न भावों से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण सूक्तियां नीचे प्रस्तुत हैं--जो जग काम नचावन जेही..
जगत में ऐसा कौन है, जिसे काम ने नचाया न हो [उत्तरकांड]
खल सन कलह न भल नहिं प्रीति
खल के साथ न कलह अच्छा न प्रेम अच्छा [उत्तरकांड]
केहिं कर हृदय क्रोध नहिं दाहा
क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया [उत्तरकांड]
चिंता सांपिनि को नहिं खाया
चिंता रूपी सांपिन ने किसे नहीं डंसा [उत्तरकांड]
तप ते अगम न कछु संसारा
संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो तप से न मिल सके [बालकांड]
तृष्णा केहि न कीन्ह बीराहा
तृष्णा ने किसको बावला नहीं किया [उत्तरकांड]
नवनि नीच के अति दुःखदाई,जिमि अंकुस धनु उरग विलाई
नीच का झुकना भी अत्यन्त दुखदायी होता है, जैसे -अंकुश, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना .[उत्तरकांड]
परहित सरस धरम नहिं भाई
परोपकार के समान दूसरा धर्म नहीं है [उत्तरकांड]
पर पीडा़ सम नहिं अधमाई
दूसरों को पीडित करने जैसा कोई पाप नहीं है [उत्तरकांड]
दुचित कतहुं परितोष न लहहीं
चित्त के दोतरफा हो जाने से कहीं परितोष नहीं मिलता [अयोध्या कांड]
तसि पूजा चाहिअ जस देवाजैसा देवता हो, वैसी उसकी पूजा होनी चाहिए [अयोध्याकांड]
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं
प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं
संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसको प्रभुता पाकर घमंड न हुआ हो [बालकांड]
प्रीति विरोध समान सन
करिअ नीति असि आहि
प्रीति और बैर बराबरी में करना चाहिए [लंकाकांड]
मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला
सभी मानस रोगों की जड़ मोह / अज्ञान है [उत्तरकांड]
कीरति भनिति भूति भलि सोई
सुरसरि सम सब कहं हित होई
कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की भांति सबका हित करती है [बालकांड]
सचिव बैद गुरु तीनि जौं ,प्रिय बोलहिं भय आस
राज, धर्म,तन तीनि कर,
होई बेगहिं नास
मंत्री, बैद्य और गुरु ये तीन यदि अप्रसन्नता के भय या लाभ की आशा से ठकुरसुहाती कहते हैं तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीनों का शीथ्र ही नाश हो जाता है [सुन्दरकांड]
लोकमान्यता अनल सम, कर तपकानन दाहु
लोक में प्रतिष्ठा आग के समान है जो तपस्या रूपी बन को भस्म कर डालती है [बालकांड]
रामचरितमानस की अगणित सूक्तियों में से ये मात्र बानगी है। हमारे वैयक्तिक एवं सामूहिक जीवन में कभी अंधकार दिख पडे तो इन सूक्तियों सेप्रकाश मिलता है।


[ 'स्वतंत्र वार्ता' से साभार ]


6 comments:

  1. इस सुंदर जानकारी के लिये ...
    धन्यवाद

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  2. रामचरित मानस की पक्तिंयॉं हमेशा जीवन को प्रेरणा देती रहती है, जब भी मन में कोई व्‍यथा हो ये पक्तियॉं गुनगुनाते ही सब ठीक हो जा है।

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  3. मै बहुत दिनों से ऐसे ही किसी ब्लॉग की तलाश में था कोई भी एक चौपाई लेकर अपने मतानुसार और उस पर विद्वानों की क्या राय है उससे पाठकों को अबगत कराइए /विचार तो सभी विद्वानों के एक से ही रहते हैं और अर्थ राम चरित मानस में लिखा ही रहता है गीता प्रेस की में तो मुद्रण त्रुटी भी सम्भव नहीं /किसी चौपाई या दोहे का रामसुख दास जी ने कैसा .डोंगरे जी ने कैसा .मुरारी बापू ने कैसा साहित्यिक विवेचन किया है उस वाबत बाल्मीकि ने कुछ कहा हो तो वह भी ऐसा कुछ शुरू करने का कष्ट करें

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  4. आपके माध्यम से कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्री रामचरित मानस की सूक्तियों का पठन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.
    साधुवाद स्वीकार करें

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  5. sundar jaankaari ke liye aabhaar..

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